कर्तव्य पथ.…. चैप्टर 6
चैप्टर 6
बभना घर और भाई बहन के देख भाल में व्यस्त रहती थी। किसी यजमान ने एक गाय राम अंजोर को दान में दे दी थी। उसकी सेवा चारा-पानी की जिम्मेदारी भी बभना की ही थी। वो उसे खूब खिलाती, खूब सेवा करती जिससे जल्दी से वो ढेर सारा दूध देने लगे। जिससे उससे प्यारे भाई हरिया और जगिया पेट भर के दूध पी सकें। गांव देहात की ये पुरानी परंपरा या रिवाज है कि चाहे कितना भी अच्छा नाम क्यों न रक्खा जाए…, वो कुछ समय में ही एक अलग नाम बन जाता है। बिभावती बभना हो गई, प्रभा को परभिया नाम दे दिया गया, शोभा.. सोभिया हो गई। और जगदेव जगिया, हरदेव हरिया बन गए।
गोदावरी देवी हर साल प्रयाग राज में माघ में लगने वाले मेले में कल्प - वास के लिए जाती थीं। अब वो अपना अगला जन्म सुधारने और इस जन्म में मुक्ति की कामना से हर साल गंगा की रेती पर एक महीने पूजा-पाठ, प्रवचन और ध्यान में बिताती थी।
इस बार भी दस दिन पहले से तैयारी होने लगी। सीधा - पिसान, बरतन - भाड़े सब कुछ एक-एक चीज याद कर कर के इकट्ठा किया जाने लगा।
जाने वाले दिन हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी घर के बैल को गांव के ही एक व्यक्ति से उसकी गाड़ी मांग कर जोत दिया गया।
फिर नीचे पैरा बिछा कर फिर उस पर दरी बिछा कर दादी गोदावरी देवी को बैठने का प्रबंध कर दिया गया। पीछे की तरफ सब जरूरी रोज मर्रा की जरूरत की चीजे रख दी गईं।
जब से पियारी की मौत हुई थी तभी से नन्हा हरिया दादी का खास स्नेह पात्र बन गया था। अब वो अक्सर दादी की ही गोद में ही रहता था। क्योंकि एक दिन बभना काम में भिड़ी हुई थी और वो खटिया से नीचे गिर गया। सिर में बड़ा सा गूमड़ निकल आया था। उसी दिन से गोदावरी देवी ने ये कह कर कि सारा दिन खाली ही तो बैठी रहती हूं। मेरे पास कर दिया कर। मैं पास बिठा कर उसे खेलाती रहूंगी। मालिश कर, नहला धुला कर बभना उसे दादी को पकड़ा देती। वो उसे संभाले रहती तो बभना खाना-पीना निपटा लेती।
अब जब दादी गोदावरी एक महीने के लिए कल्प - वास करने जा रही थी तो एक चिंता ये भी इस बार थी कि हरिया कैसे रहेगा..? कौन उसे उस वक्त संभालेगा जब बभना घर के काम कर रही होगी…? कही चोटिल ना हो जाए..! पर जाना तो था ही।
सारी तैयारी होने पर जब बड़े बेटे बहू ने आकर कहा,
"चलो .. अम्मा सब कुछ रक्खा गया है। बस तुम्हारा ही इंतजार हो रहा है। जल्दी करो वरना पहुंचने में रात हो जायेगी।"
गोदावरी ने हरिया को सीने से लगा कर दुलारा। मां की ममता से वंचित बच्चे के प्रति उन्हें कुछ ज्यादा ममता जी गई थी। फिर उसको सोभिया को देना चाहा। पर वो हरिया खुद को दादी से अलग करने की कोशिश करते देख और भी जोर से चिपक गया।
गोदावरी देवी हरिया का प्यार देख हंसने लगी और उसे चूमते हुए समझाने की कोशिश करते हुए बोली,
"जा.. भईया.. दीदी के पास..। मैं जा रही हूं ना। तेरे लिए झुनझुना और गाड़ी ले आऊंगी। जा दीदी के पास।"
पर मासूम हरिया के मन में झुनझुना और गाड़ी के प्रति कोई उत्साह नही दिखा।
उसे तो बस दादी की गोद चाहिए थी। अगर वो दादी के साथ मिल जाए तो ठीक वरना दादी के दूर जाने की कीमत पर तो बिलकुल भी नहीं चाहिए था झुनझुना और गाड़ी तो क्या बल्कि कोई भी खिलैना नही।"
बड़े बेटे बहू को चलने में देरी हो रही थी। उनको दादी पोते का ये लाड - प्यार जरा भी रास नहीं आ रहा था। वो खीझते हुए आगे आए। बहू तो तमक कर बिना उनका इंतजार किए बैलगाड़ी पर जा कर बैठ गई।
बेटा उनके पास आकर लगभग छीन कर हरिया से उनको अलग किया। फिर हरिया को सोभिया को पकड़ा दिया।
इस तरह खींचने से हरिया घबरा गया और डर कर और भी तेजी से रोने लगा।
उसकी रोने की आवाज सुन कर हाथ का काम छोड़ कर बभना भाग कर बाहर आई। और रो कर मचलते हुए हरिया को सोभिया की गोद से ले लिया।
गोदावरी के बैठते ही इस चिल्ल पों से खीजे उनके बेटे के बैलगाड़ी आगे बढ़ा दिया।
गोदावरी रोते हुए हरिया को निहारती रही जब तक वो दिखना बंद नही हो गया।
उनके ओझल होते ही बभना रोते हरिया को लेकर अंदर आ गई। बहुत कोशिश किया कि उसे चुप करा दे। पर वो किसी तरह नही माना रोता ही रहा।
जब रोते रोते थक गया तो निढाल हो कर सो गया। धीरे से बभना ने उसे खटिया पर लिटा दिया। और बगल में तकिया लगा दिया जिससे उसे ऐसा महसूस हो कि दीदी उसके साथ ही लेटी हुई है।
सोते हुए हरिया को देख कर बभना का दिल द्रवित हो गया। आंखों का काजल आंसू के साथ गालों पर बह कर निशान बना गया था। सोते सोते भी रुक रुक कर हिचकी आ जा रही थी। प्यार से सिर पर हाथ फेर सभी को हल्ला नही करने की नसीहत दे कर वो बाकी का काम निपटाने चली गई।
जिस उम्र में लडकिया खेलती - कूदती है, उसे उसी उम्र में मां बन कर अपने चार चार छोटे भाई बहनों को पालना पड़ रहा था। पिता के भी देख भाल करनी पड़ रही थी। पर क्या करती..! पूरा गांव राम अंजोर की किस्मत को कोसता था। भगवान ने इसके साथ बड़ा अन्याय किया है। साथ ही इस लिए इसके भाग्य को सराहते भी थे कि उसको बभना जैसी जिम्मेदारी, समझदार बेटी दी है। अगर वो ना होती तो राम अंजोर और उसके बच्चों का क्या होता वो ईश्वर ही जाने। पर भगवान ने शायद सब कुछ सोच विचार कर के ही रचा था। पियारी को उसे अपने पास जल्दी बुलाना था इस लिए जल्दी पहली संतान के रूप में बभना जैसी बेटी उसके घर को संवारने के लिए भेजी थी। जो अपने पिता के साथ ही अपने छोटे भाई बहन का भी खयाल रख सके।
हरिया शायद कुछ ज्यादा ही रो लिया था। बड़ी देर तक सोता रहा।
रात का भी खाना - पीना निपट गया। वो सोता ही रहा। उसका पेट पिचक कर बिलकुल पीठ के बराबर हो गया था। बभना तड़प उठी ये देख कर। उस को लगा कि हरिया भूखा है। उसे उठा कर दूध पिला दूं या कुछ खिला दूं। दूध छोटी सी गिलास में ले कर उसे जगाया। फिर गोद में ले कर उसे पिलाने लगी वो वास्तव में भूखा था।
आगे क्या हुआ जानने के लिए पढ़ें अगला भाग।
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