कर्तव्य पथ. चैप्टर 3
चैप्टर 3
बैदाइन काकी को साथ ले कर राम अंजोर भीतर दाखिल हुआ।
बैदाइन काकी "क्या हुआ. दुलहिन…? कहते हुए अंदर कमरे में दाखिल हुई।
बैदाइन काकी की आवाज सुन कर पियारी खटिया से उठ कर घूंघट खींच कर उनके पांव छूने लगी।
बैदाइन काकी सिर पर हाथ रख कर "खुशी रह. खुशी ."आशीर्वाद दिया और खटिया पर बैठ गई।
नीचे जमीन पर बैठी पियारी से उसके कान में फुसफुसा कर कुछ पूछा।
उसी तरह पियारी ने भी लजाते हुए काकी के कान में फुसफुसा कर उनके पूछे सवाल का जवाब दिया।
उम्मीद के मुताबिक उत्तर पा कर काकी हंस पड़ी और बोली,
"ये तेरा बैल बुद्धि पति…तेरे बैल बुद्धि.. वैद्य काका से दो दिनों से अपच की दवा ला कर तुझे खिला रहा है। आज भी अगर मैने ना सुन लिया होता तो तेरा ऐसे ही इलाज जाने कब तक चलता…! शायद जब तक सउरी ना बैठ जाती तू। (फिर सिर में धीरे से थपकी देते हुए मीठी सी झिड़की के साथ बोलीं) तू कितनी मूर्ख है रे…! अपने मां बनने की आहट भांप ना पाई। चल कोई बात नही। तेरी सास जेठानियां बताएं या ना बताए मैं तुझे समझा देती हूं। देख… अब से तू भारी सामान.. बाल्टी.. या कोई भी भारी काम चार महीने तक मत करना। धीरे धीरे चलना.. उछलती.. कूदती मत चलना..। अपने खाने पीने का ध्यान रखना..,जब ना कुछ हो तो उपवास मत करना.. बिना संकोच इस राम अंजोर को मेरे पास भेज देना। मैं दे दूंगी। देख.. राम अंजोर तू भी खुद ही पहले सब कुछ खा पी कर खत्म मत कर देना। इसके लिए भी बचा है या नही इस बात का ख्याल रखना। अब मैं चलती हूं।"
इतना सब कुछ समझा बुझा कर बैदाइन काकी चली गई।
राम अंजोर को समझ नही आ रहा था कि खुश हो या दुखी हो। बाप बनने जा रहा था इस बात से थोड़ा गर्व महसूस हो रहा था। क्योंकि उसके बड़े भाई की अभी तक कोई औलाद नहीं हुई थी। उनसे सात साल छोटा था और अब बाप बनने जा रहा था।
परंतु फिर दूसरे ही पल ये सोच कर दुखी हो गया कि अभी जब दो जन का ही खर्चा नहीं चल पा रहा है तो फिर एक बच्चा आ जाने के बाद कैसे खर्चा पूरा पड़ेगा..?
पर क्या किया जा सकता है .! जो कुछ हुआ उसमे उसकी और पियारी की कोई गलती भी तो नही है। जब एक साथ थे जो खाने पीने के जुगाड़ की चिंता और घर चलाने की कोई जिम्मेदारी नहीं थी। पेट की भूख तो शांत हो जाती थी, पर तन मन की शांति.. और उसकी प्यास मिटाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते थे। घर के बाकी मर्दों की तरह वो भी बाहर सोता था। पियारी अंदर जेठानियों और सास के साथ। बड़ी ही मुश्किल से रात भर जागने और इंतजार करने के बाद कभी कभी घर के किसी कोने में छुप छुपा कर घड़ी दो घड़ी का साथ नसीब होता था।
अब जब बाबू जी ने अलगा दिया तो और चाहे लाख परेशानी हो.. पर पियारी का साथ मिलने की सारी बाधा दूर हो गई थी। जब उसका जी चाहता चाहे दिन दोपहर हो या रात बिरात, वो पियारी का साथ पा सकता था। फिर जब निर्बाध प्रेम था तो उसका इस तरह का नतीजा आना कोई हैरत वाली बात नही थी।
पियारी के चेहरे पर असमंजस के भाव देख कर वो खुद पर काबू कर के उसे समझाते हुए बोला,
"देख.. तू चिता मत कर..। जो भी इस दुनिया में आता है भगवान की मर्जी से ही आता है। फिर भगवान सिर्फ मुंह दे कर थोड़ी ना भेजते है..! साथ में दो हाथ भी तो देते हैं। सब भगवान पर छोड़ दे वो जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे। बस जैसा काकी ने समझाया है वैसे ही अपना ध्यान रखना।"
कह कर राम अंजोर ने उसे बाहों में भर लिया।
लजा कर पियारी उसे बिना बल के इस्तेमाल के परे करते हुए बनावटी नाराजगी से बोली,
"अब देखो… तुम फिर से शुरू हो गए। इसी तुम्हारी बेताबी का ही नतीजा है जो मैं उल्टियां कर रही हूं। अब दूर रहो मुझसे।"
राम अंजोर बाहों का घेरा कसते हुए बोला,
"अरे… भागवान..! दूर तो मैं चला जाऊं पर पहले तू मुझे अपनी पकड़ से आजाद तो कर।"
बैदाइन काकी वापस अपने घर चली गई थीं। कोई आस पास नही था। राम अंजोर और पियारी के बीच बाधा उत्पन्न करने को। दूर जाने के लिए एक दूसरे को कहते हुए वो वो और पास आते गए।
जब राम अंजोर के घर में सब को खबर पता चली तो उनके पिता ने कोई मदद नहीं की। बल्कि ये हिदायत दे कर सब को दूर रहने को बोल दिया कि अब इतनी बड़ी जिम्मेदारी सर आ रही है तो जरूर राम अंजोर जिम्मेदार बन जायेगा। हां घर की औरते जरूर छुप छुपा कर सहायता कर देती थीं। बैदाइन काकी जब भी कुछ अपने घर में छन्न छुन्न करती जरूर पियारी के लिए एक कटोरी में दे देती ये कहते हुए कि ले खा ले वरना तेरा जी ललचाएगा तो बच्चा लार चुआयेगा।
समय बीतता रहा।
नौ महीने पूरे हो गए। दसवां लगते ही आस पड़ोस और घर की महिलाएं ये अनुमान लगाने लगीं कि गर्भ में बेटी ही है। तभी ज्यादा वक्त लग रहा है। सुन कर पियारी और राम अंजोर का चेहरा विवर्ण हो जाता। एक तो गरीबी दूसरे बेटी हो जायेगी तो कैसे उसे देहरी डका पाएंगे।
समय पूरा होने पर पियारी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। बैदाईं काकी और दाई के सहयोग से उसने एक बेटी को जन्म दिया।
सब का अंदाजा सही निकला था।
पर बेटी पर निगाह जाते ही पियारी की सारी पीड़ा और चिंता गायब हो गई। मक्खन सी उजली बेटी हुई थी उनके घर। उस पर जैसे किसी ने केसर घोल कर मिला दिया हो दोनो गालों के मक्खन पर। बड़ी बड़ी जामुन सी काली काली आंखें।
राम अंजोर भी उसे देख कर मंत्र मुग्ध हो गया। उसकी बेटी किसी राजकुमारी सी खूबसूरत है।
बड़े ही प्यार से राम अंजोर और पियारी ने बच्ची का नाम बिभावती रक्खा।
इधर जैसे उसके बड़े भईया और भाभी पर भी भगवान की दया दृष्टि डालने का यही वक्त चुना था।
पियारी के घर बेटी के जन्म के बाद बड़ी बहू भी गर्भवती हो गई। जैसे उसे पहले पियारी के मां बनने का ही इंतजार था। बिभावती के जन्म के ठीक नौ महीने बाद बड़ी बहू ने भी एक बेटी को जन्म दिया। पर बिभावती के बिलकुल विपरीत रंग रूप पाया था बड़ी बहु की बेटी ने। एक तो इतने साल बाद संतान का मुंह दिखाया था भगवान ने। इतने देर से बेटी दी उसका कोई मलाल नहीं था। पर कम से कम बिभावती जैसी सुंदरता तो दी होती।
वैसे तो बड़ी बहू बहुत प्यार दुलार देती अपनी इस अनमोल पहली संतान को। पर जैसे ही बभना पर नजर पड़ती तो ईर्ष्या से तड़प उठती। खूब अच्छे अच्छे कपड़े पहना कर वो अपनी बेटी की सुंदरता को निखारने का असफल प्रयास करती थी। फिर अपनी असफलता पर खीज उठती थी।
धन के अभाव ओर मन की रईसी के बीच बिभावती पलने बढ़ने लगी।
जो भी मंत्र जप आरती, भजन वो कहीं भी सुनाती उसे तुरंत ही याद हो जाता था। मधुर कंठ से बाज उच्चारण करती तो सुनने वाला मंत्र मुग्ध हो कर सुनने लगता। पिता के साथ मंदिर की सीढ़ियों पर छोटी सी बच्ची बैठी रहती। पिता के साथ साथ वो भी मंत्र बोलती। उसके कंठ में जैसे सरस्वती का वास था। मीठी जुबान से स्पष्ट मंत्र उच्चारण सुनने वाले का मन मोह लेते। उसकी भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति देख कर कब उसका नाम बिभावती से बभना पड़ गया उसे भी पता नही चला। अब पूरा गांव नाते दार, रिश्तेदार सब उसे बभना कह कर ही पुकारते थे।
क्या मोड़ आया बभना की जिंदगी में अगले भाग में पढ़े।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें