कर्तव्य पथ..चैप्टर 5

चैप्टर 5






अभी दो कौर खाना थाली में बचा हुआ ही था कि कमरे से हूं… हूं… की बड़ी विचित्र सी आवाज आने लगी। शोभा वही अपने पिता के पास खड़ी हुई थी। जब सवालिया नजरों से राम अंजोर ने उसकी ओर देखा तो वो बोली,

"बाबू.. आप खाओ.. मैं देखती हूं।"

जिम्मेदारियों ने बच्चियों को समय पूर्व ही बड़ा कर दिया था। उसे भी पता था कि खाना छोड़ कर या फिर परसी थाली छोड़ कर नही उठा जाता है। दौड़ कर अम्मा के पास गई। देखा तो वो बेचैनी से अपना आधा शरीर मरोड़ रही हैं, तेजी से सांसे चल रही है और ये आवाज उनके ही गले और नाक से आ रही है।

जल्दी से शोभा ने खटिया पर अम्मा के बगल बैठ कर उनके बदन को सहलाते हुए अधीर हो कर बोली,

"क्या हुआ अम्मा…! ज्यादा दर्द हो रहा है..? तुम चिंता मत करो मैं अभी बाबू को वैद्य बब्बा के घर भेजती हूं। वो बस खा ही चुके है। सिर्फ दो कौर ही बाकी है।"

पर पियारी के कान में जैसे शोभा की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही थी। बच्ची की ताकत उसे संभालने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उसकी नन्ही कलाइयों में इतना जोर नही था कि एक आत्मा त्यागती शरीर की कंपन को संभाल पाती। अपनी बातों पर अम्मा को ध्यान नही देते देख कर फिर वहीं से जोर से चिल्लाई.….

"बाबू…! बाबू…! आओ देखो ना.. ये अम्मा कैसे.. कैसे.. कर रही है..!"

शोभा की आवाज सुन कर जल्दी से हाथ धो कर राम अंजोर अपनी धोती में ही हाथ पोछते हुए तेजी से पियारी के पास आया। 

खटिया पर तड़पती पियारी की हालत देख कर राम अंजोर को मालूम हो गया कि अब पियारी इस माया जगत को छोड़ कर अनंत यात्रा पर जाने वाली है। सुबह उसकी हालत में अचानक हुए सुधार ने उसके मन से संदेह के बीज सुबह ही बो दिए थे। कही ये दीपक बुझने से पहली वाली एक बार चटक लौ की तेजी तो नही है..! अंदेशा सच साबित हो गया। 

वो शांती से आकर पियारी के सिरहाने बैठ गया। 

अब तक बभना, परभा, जगदेव सब चारो ओर से अपनी अम्मा की खटिया घेरे खड़े हुए थे। राम अंजोर ने हरदेव को पियारी के बगल में बिठा दिया। इस उम्मीद में कि कहते है मां के प्राण बच्चों में ही बसते हैं। अपने दुधमुहे बच्चे के मोह में हो सकता है छूटते प्राण वापस आ जाए..। हो सकता है यमराज को और किसी पर तो ना सही कम से कम इस मासूम बच्चे पर ही दया आ जाए और वो पियारी के प्राण ले कर जाने का अपना फैसला बदल दें। हरदेव मां के सीने से साड़ी खींचने लगा। और उसे खींच खींच कर अपनी भूख मिटाने के लिए अपना मुंह साड़ी हटा कर रगड़ने लगा।

पर ऐसा कोई चमत्कार नहीं हुआ। 

पियारी की हालत बिगड़ती गई।

और कोई उपाय नहीं देख निराश राम अंजोर ने फैसला लिया कि पियारी जब तक जी सुख चैन नसीब नही हुआ। अब कम से कम अपना आखिरी सफर तो चैन से तय करे।

बच्चे मां की हालत देख कर चिल्ला चिल्ला कर रो रहे थे। उनकी रोने की आवाज सुन कर राम अंजोर की मां और भाई भौजाई सब भाग कर आ गए। साथ ही आस पास जिसने भी सुना सभी दौड़े भागे आए।

पर राम अंजोर के कुछ करने से पहले ही उसकी मां गोदावरी आ गई। जल्दी से बड़ी बहू से तुलसी दल और गंगा जल लाने को बोला। 

तुलसी दल और गंगा जल आते ही उसे पियारी के मुंह में राम अंजोर के हाथो डलवाया। फिर एक सिक्का दे कर गऊ दान करवाया।

जैसे पियारी के प्राण इसी सब के लिए अटके हुए थे। गऊ दान करवाते ही उसके आंखे उलट गई और शरीर शांत हो गया। हरदेव अपनी भूख शांत नही होने पर पूरी ताकत से चीख रहा था।

हरदेव के साल भर के होने के पहले ही पियारी ने अपनी आंखे सदा के लिए बंद कर ली। जैसे उसे अपनी सारी मुसीबतों.. सारी समस्याओं से निजात पाने का बस यही एक तरीका नजर आया।

राम अंजोर की मां गोदावरी देवी ने मासूम हरदेव को पियारी के बगल से उठा कर अपने सीने से लगा लिया। अपने आंसू पोंछ कर दोनो पोतों को अपने अंकवार में भींच लिया।

पियारी को खटिया से उतार कर बाहर नीचे पैरा बिछा कर लिटा दिया गया। राम अंजोर तो जैसे अपना दूध बुध ही खो बैठा था। उसकी आंखे सूखी हुई थीं। बाहर वही पियारी के पास जमीन पर माथे पर हाथ रक्खे बैठा हुआ था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस अचानक आई विपत्ति का सामना वो कैसे करे..!

बे मन से ही सही और राम अंजोर के पिता और भाई को गांव समाज में अपनी इज्जत बचानी थी। इस लिए पियारी के अंतिम संस्कार को विधि विधान से करने की तैयारी करने लगे। 

कुछ घंटे बाद ही लाल सुर्ख साड़ी में लिपटी, पैरो में चटक महावार लगाए पियारी की मांग में राम अंजोर के हाथों से सिंदूर भरवाया जा रहा था। ये आखिरी रस्म होते ही पियारी को चार कंधों पर ले कर सब चल पड़े। कुछ दूर तक पांचों बच्चे पीछे पीछे चलते रहे। नन्हा हरदेव बभना की गोदी में चिपका हुआ था।

देखते ही देखते शुद्ध और तेरही की रस्म भी पूरी हो गई। अब बभना ही पूरे घर की कर्ता धर्ता हो गई। सब भाई बहन को मां बन कर पालना अब उसकी जिम्मेदारी थी। बड़ी की सूझ बूझ से उसने पूरे घर की जिम्मेदारी उठा ली। 

और गोदावरी… उनकी तो जैसे सारी वैमनस्यता ही पियारी के जाते धुल गई। वो अपने पोते पोती की भरसक देख भाल करने की कोशिश करती थीं। पर उनके बाकी बेटे बहू को अपनी मां का इस तरह छोटे भाई के परिवार के लिए हमदर्दी नही भा रही थी। और कुछ लेना देना तो बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं था। अब घर में उनका मलिकाना था उनकी इच्छा चलती थी। माता पिता अब बस द्वार की शोभा बने हुए थे। जब कमाते नहीं हैं तो खर्च करने का भी अधिकार नहीं है। 

अपने पहले के राम अंजोर के प्रति किए व्यवहार के प्रति वो पछताते भरसक राम अंजोर की मदद करने की कोशिश करते थे। पूरे घर की खिलाफत करके वो बच्चों के लिए दूध दे दिया करते थे।

अब बभना बड़ी हो रही थी उसे मंदिर ले जाने से राम अंजोर को शर्म भी आती थी और घर की जिम्मेदारी निभाने के बीच उसके पास समय भी नही था।


क्या हुआ जानने के लिए पढ़ें अगला भाग।


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