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जो तू आ गई

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कर्त्तव्य पथ...भाग 7

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चैप्टर  7 गटागट हरिया ने दूध पी लिया। जब पेट भर गया तो उसे दादी की याद आई। चारों ओर खोजती निगाह से देखा और फिर बाहर की ओर हाथ दिखा कर दादी के पास जाने का इशारा कर करे ठुनकने लगा। बभना उसे बहलाते हुए बाहर ले कर आई और बोली, "दादी इलाहाबाद गई है। माघ मेला लगा हुआ है वहां। दादी मेरे भईया के लिए गाड़ी और झुनझुना लाने गई है। भईया खेलेगा ना।" हरिया को झुनझुना और गाड़ी चाहिए तो था, पर दादी को दूर भेज कर नही। अब उसे ये पक्का यकीन हो गया कि दादी चली गई है। अब बहुत दिनो। बाद ही आयेगी। वो पूरी ताकत से चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा। किसी भी तरह नही मान रहा था। बभना था भयंकर ठंडी होने के बावजूद भी उसे बाहर घुमा रही थी जिससे कि वो चुप हो जाए। दिन भर की थकान के बाद खा पी कर राम अंजोर सोने के लिए लेटा हुआ था। जैसे ही आंखे लगी उसकी हरिया का रोना चालू हो गया।  पहले तो उसने उस और से ध्यान हटाने का पूरा प्रयास किया। पर कुछ असर नहीं हुआ। फिर उसने तकिया और रजाई से अपने कानों को ढंक लिया। इस बार भी उसकी कोशिश कामयाब नही हुई। हरिया के रोने की आवाज तकिया और रजाई को चीरते हुए उसके कानों में गूंज रही थी। उस...

मजबूरी

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हार

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कर्तव्य पथ.…. चैप्टर 6

 चैप्टर 6 बभना घर और भाई बहन के देख भाल में व्यस्त रहती थी। किसी यजमान ने एक गाय राम अंजोर को दान में दे दी थी। उसकी सेवा चारा-पानी की जिम्मेदारी भी बभना की ही थी। वो उसे खूब खिलाती, खूब सेवा करती जिससे जल्दी से वो ढेर सारा दूध देने लगे। जिससे उससे प्यारे भाई हरिया और जगिया पेट भर के दूध पी सकें। गांव देहात की ये पुरानी परंपरा या रिवाज है कि चाहे कितना भी अच्छा नाम क्यों न रक्खा जाए…, वो कुछ समय में ही एक अलग नाम बन जाता है। बिभावती बभना हो गई, प्रभा को परभिया नाम दे दिया गया, शोभा.. सोभिया हो गई। और जगदेव जगिया, हरदेव हरिया बन गए। गोदावरी देवी हर साल प्रयाग राज में माघ में लगने वाले मेले में कल्प - वास के लिए जाती थीं। अब वो अपना अगला जन्म सुधारने और इस जन्म में मुक्ति की कामना से हर साल गंगा की रेती पर एक महीने पूजा-पाठ, प्रवचन और ध्यान में बिताती थी।  इस बार भी दस दिन पहले से तैयारी होने लगी। सीधा - पिसान, बरतन - भाड़े सब कुछ एक-एक चीज याद कर कर के इकट्ठा किया जाने लगा। जाने वाले दिन हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी घर के बैल को गांव के ही एक व्यक्ति से उसकी गाड़ी मांग कर जोत दि...

कर्तव्य पथ. चैप्टर 3

 चैप्टर 3 बैदाइन काकी को साथ ले कर राम अंजोर भीतर दाखिल हुआ।  बैदाइन काकी "क्या हुआ. दुलहिन…? कहते हुए अंदर कमरे में दाखिल हुई।  बैदाइन काकी की आवाज सुन कर पियारी खटिया से उठ कर घूंघट खींच कर उनके पांव छूने लगी। बैदाइन काकी सिर पर हाथ रख कर "खुशी रह. खुशी ."आशीर्वाद दिया और खटिया पर बैठ गई।  नीचे जमीन पर बैठी पियारी से उसके कान में फुसफुसा कर कुछ पूछा। उसी तरह पियारी ने भी लजाते हुए काकी के कान में फुसफुसा कर उनके पूछे सवाल का जवाब दिया। उम्मीद के मुताबिक उत्तर पा कर काकी हंस पड़ी और बोली, "ये तेरा बैल बुद्धि पति…तेरे बैल बुद्धि.. वैद्य काका से दो दिनों से अपच की दवा ला कर तुझे खिला रहा है। आज भी अगर मैने ना सुन लिया होता तो तेरा ऐसे ही इलाज जाने कब तक चलता…! शायद जब तक सउरी ना बैठ जाती तू। (फिर सिर में धीरे से थपकी देते हुए मीठी सी झिड़की के साथ बोलीं) तू कितनी मूर्ख है रे…! अपने मां बनने की आहट भांप ना पाई। चल कोई बात नही। तेरी सास जेठानियां बताएं या ना बताए मैं तुझे समझा देती हूं। देख… अब से तू भारी सामान.. बाल्टी.. या कोई भी भारी काम चार महीने तक मत करना। धी...

कर्तव्य पथ..चैप्टर 5

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चैप्टर 5 अभी दो कौर खाना थाली में बचा हुआ ही था कि कमरे से हूं… हूं… की बड़ी विचित्र सी आवाज आने लगी। शोभा वही अपने पिता के पास खड़ी हुई थी। जब सवालिया नजरों से राम अंजोर ने उसकी ओर देखा तो वो बोली, "बाबू.. आप खाओ.. मैं देखती हूं।" जिम्मेदारियों ने बच्चियों को समय पूर्व ही बड़ा कर दिया था। उसे भी पता था कि खाना छोड़ कर या फिर परसी थाली छोड़ कर नही उठा जाता है। दौड़ कर अम्मा के पास गई। देखा तो वो बेचैनी से अपना आधा शरीर मरोड़ रही हैं, तेजी से सांसे चल रही है और ये आवाज उनके ही गले और नाक से आ रही है। जल्दी से शोभा ने खटिया पर अम्मा के बगल बैठ कर उनके बदन को सहलाते हुए अधीर हो कर बोली, "क्या हुआ अम्मा…! ज्यादा दर्द हो रहा है..? तुम चिंता मत करो मैं अभी बाबू को वैद्य बब्बा के घर भेजती हूं। वो बस खा ही चुके है। सिर्फ दो कौर ही बाकी है।" पर पियारी के कान में जैसे शोभा की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही थी। बच्ची की ताकत उसे संभालने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उसकी नन्ही कलाइयों में इतना जोर नही था कि एक आत्मा त्यागती शरीर की कंपन को संभाल पाती। अपनी बातों पर अम्मा को ...