कर्त्तव्य पथ ..भाग 2





 चैप्टर 2


बिभावती देवी के शरीर में हरकत देख कर उन्हें अटेंड करने वाली नर्स का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हुआ। वो उठ कर पास आई। रोज यही ड्यूटी निभाने वाली नर्स कि अनुभवी आंखों से ना तो उनके आंखों से ढुलके दो बूंद आंसू छुप सके ना ही मन की पीड़ा। और उनके मुड़े हुए हाथों को सीधा कर सहलाते हुए आंखों के बड़े ही मीठे स्वर में बोली,

"मां जी..! आप दुखी ना हो। अपने ही शरीर का जो अंग पूरे शरीर में जहर फैला दे। उसे काट कर निकाल देना ही बेहतर है। आपकी जिंदगी बच गई यही बहुत बड़ी बात है।"

नर्स को आते जाते, सब जांच रिपोर्ट देखते, ये पता चल गया था कि उनके ये सगे बेटे नही हैं। वो बे औलाद हैं। वो उनके मन में उठ रहे ये सवाल को समझ गई कि वो जानना चाहती हैं कि आखिर उनको ये बीमारी कैसे हो गई…? उनको समझाते हुए बोली,

"मां जी..! आप जानना चाहती है कि आखिर आपको ये कैंसर जैसी बीमारी कैसे हो गई..! तो किसको कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। पर जितना अभी तक के अनुमान लगाए गए हैं, उनके अनुसार को औरतें मां बनती हैं और अपने बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं, उनमें स्तन कैंसर की संभावना कुछ प्रतिशत कम होती है, उन औरतों की तुलना में जो जो मां नही बन पाती। और अगर मां बनने के बाद भी अपना दूध बच्चों को नही पिलाती हैं। उनके स्तन में गांठ बन जाती है और समय बीतने के साथ यही गांठ कैंसर बन कर जहरीले नाग की भांति डसने को फन काढ़ लेता है। आज कल ये सामान्य बात है मांजी। आप चिंता मत करिए सो जाइए।"

इतना कह कर नर्स ने अपनी तरफ से पूरी तसल्ली दे कर उनको आराम से सो जाने को बोल कर कोने में रक्खे कुर्सी पर बैठ गई और अपने कागज-पत्र दुरुस्त करने लगी।

बिभावती आंखे बंद कर सोने की कोशिश करने लगी पर खुद को अपने अतीत में खोने से नहीं रोक सकी। वो अपने बचपन के उस समय में पहुंच गई, जब से उसे याद हैं। 

जौनपुर प्रतापगढ़ की सीमा से लगा एक छोटा सा गांव सेमरी। जिसमे अधिकतर घर पंडितों के थे। कुछ दूसरी बिरादरी के भी थे। सई नदी का किनारा था इस लिए खेती बारी भी नाम मात्र ही थी। अधिकतर नार खोह ही था। जो थोड़े बहुत खेत थे उसमे बजरी जोनहरी ही उपज पाता था। गेंहू की रोटी और चावल सपना ही था। कोई यजमान सीधा में दे दे तो भले ही नसीब हो जाए। इसी गांव में एक घर था पंडित राम अजोर तिवारी का। घर क्या था…एक कमरा कच्चा था उसी में पीछे छान छप्पर डाल कर रसोई बनी हुई थी और आगे सरपत छा कर ओसारा बना हुआ था। 

राम अज़ोर के ब्याह के बाद कुछ दिन तो उनके बाबू जी ने उनका खर्चा उठाया। पर फिर कुछ समय बीतने पर बाकी के कमाऊ भाई उनके इस तरह बैठ कर खाने पर विरोध करने लगे। इस पर उनके नकारे पन से ऊब कर, रोज रोज का झगड़ा बचाने की गर्ज से उनके बाबू जी उनको यही मड़ईया दे कर अलग कर दिया। 

पंडित राम अजोर तिवारी, दुबला पतला कृष काय शरीर, गेहुआं रंग जो कभी हुआ करता था, अब गरीबी आंच लग कर खूब पक्का हो गया। पिचके हुए गाल बनावट से पिछले हुए नही थे। एक समय के भोजन की वजह से सूख कर छुहारा हो गए थे। धन अर्जित करने का पुश्तैनी धंधा पंडिताई ही था। पुरखे इसी माध्यम से अपनी जीविका चलाते आए थे। 

पर पंडित राम अजोर को दो चार मंत्रों के अलावा और कुछ याद नहीं रहता था। पूजा पाठ, कर्म काण्ड भी बिना त्रुटियों के नही करवा पाते थे। यहां तक कि यजमान ही टोक देता कि पंडित जी आप गलत करवा रहे हैं। 

अल्प ज्ञान को देखते हुए जहां जहां इनके पूर्वजों की पुरोहिताई थी धीरे धीरे कम होने लगी। अब जब बहुत जरूरी नहीं होता, कोई और पंडित नही मिल पाता था तभी इनको बुलाया जाता। जब यजमानों ने धीरे धीरे बुलाना बंद कर दिया तो आमदनी का जरिया भी बंद हो गया। अब एक ही चारा था, द्वार द्वार जा कर भिक्षा मांगना। पर ये उनको ठीक नही लगा। पत्नी पियारी ने सुझाव दिया कि आप दिन के हिसाब से मंदिर के बाहर बैठो, लोगों को तिलक लगा दो कलावा बांध दो। लोग कुछ ना कुछ तो दे ही देंगे। भीख मांगने से उचित उनको पत्नी का विचार लगा।

अब वो सोमवार को देवी माता के मंदिर के बाहर, मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर के बाहर, बुधवार को गणेश जी के मंदिर के बाहर, बृहस्पतिवार को विष्णु भगवान के मंदिर के बाहर इसी तरह वो रोज दिन के अनुसार मंदिर के आगे बैठने लगे। कभी कोई एक दो फल फूल दे देता, कभी एक दो आने या एक दो मुठ्ठी अनाज। 

पत्नी की युक्ति कारगर थी। ज्यादा तो नही पर फांका करना बंद हो गया। गृहस्ती की गाड़ी रेंगने लगी। 

अभी कुछ महीने ही अलग हुए बीते थे कि पत्नी को उल्टियां शुरू हो गई। सोचा कुछ बासी तेवासी खा पी लिया होगा बेकार होने से बचाने के लिए। भाग कर वैद्य जी के पास गए। वैद्य जी ने कुछ चूरन वुरन दे दिया। पर दो दिन बाद भी उसे आराम नही हुआ। कुछ भी खाती पचता ही नही था। तुरंत उल्टी हो जाती थी। 

फिर राम अज़ोर वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी से पत्नी की परेशानी बताई। वो फिर से पुड़िया लपेटने लगे। बैदाइन भी सब देख सुन रही थी। सब संकोच छोड़ कर मुंह बना कर नाराज होते हुए वैद्य जी से बोली,

"छह छह बच्चों के बाप बन गए और अकल का अकाल पड़ा है। उल्टी की पुड़िया दो दिन से खिलाए जा रहे हैं। अरे..! जवान है, .. दो साल पहले शादी हुई है। क्या मां नही बन सकती..! अरे..! वैद्य जी…! अपच और हमल की उल्टी में फर्क करना सीखो.. वरना तुम भी इसी राम अजोर की तरह मंदिर के सामने बैठ कर टीका कलावा करते रहना।"

राम अजोर और वैद्य जी दोनो मुंह बाए बैदाईन की बात सुन रहे थे। 

वैद्य जी ने अपनी बुद्धि पर लानत दी कि आखिर इस ओर उनका दिमाग क्यों नही गया। अपनी खीज छुपाते हुए बोले,

"ज्यादा चालाक मत बन। मैं उसी की दवा दे रहा हूं। क्या गाना जरूरी है..! तेरी तरह हर कोई बेशर्म तो नही हो सकता ना। अब ये बेटा सामान है, इससे क्या पूछूं..? क्या बोलूं..?"

राम अजोर ने उनकी बातें सुन कर शर्म में अपना सिर गड़ा लिया।

बैदाईन खड़ी होते हुए बोली,

"चल रे… राम अजोर..! मैं चलती हूं तेरे साथ। छोड़ इनकी पुड़िया बुडिया। मैं देखती हूं क्या हुआ है तेरी दुलहिन को।"

इसके बाद राम अजोर बैदाइन काकी के साथ अपने घर आ गया।


आगे क्या हुआ पढ़ें अगले भाग में।





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